पर ही हैँ डर

मुझे कुछ करना तो हैँ पर, 

मे सोचता तो हूं पर, 

मे करना चाहता तो हूं पर…

            अरे भाई! कौन हैँ ये पर,  हैँ कहाँ ये पर जिसे तू अपने अंदर दबाये जी रहा हैँ…  पहले ये समज ये पर ही तो तेरा वो आलस हैँ जो तुझे तेरे वजूद मे रोकता हैँ तुझे कुछ बनने से रोक रहा हैँ ये,  तेरा वो आलस जिसके सहारे तू सब इस ‘पर के भाई कल’ पर छोड़ रहा हैँ,  अरे वो कल ना कभी तेरा था,  ना कभी वो कल आएगा. क्योंकि तूजे तेरा ये आलस ये पर उस कल को कभी आने ही नहीं देंगे.  क्योंकि तू इस पर के सहारे अपने काम को कल पर छोड़ रहा हैँ उसे तेरा आलस जान चूका हैँ की तू उस काम को कभी करना ही नहीं चाहता…. 

            चल अब इससे बाहर निकलते हैँ तेरे इस आलस वाले पर को हराने की बात करते हैँ…  मना की 100 वजह हैँ तेरे उस काम को ना करने की पर कोई एक वजह तो ढूंढ ले उसे करने की उस कल को अपने आज मे जीले उस अपना दिन बनाले…  मे ये जरूर करूँगा नहीं बोल मे ये करूँगा ही कर दिखाऊंगा ही…  और उस काम के लिए आज तो कुछ करले भाई! कुछ ऐसा जो भी तुझे अच्छा लगे..  उससे रेलेटेड बुक का एक पेज ही पढ़ ले,  उसे करने वाले किसी एक की शुरुआत ही सुन ले,  या देख ले उसे कोई कैसे कर रहा हैँ,  क्यूंकि तेरा ये कल वाला काम किसी एक ने नहीं बहोत से लोगो ने उससे अपने कल मे कर भी लिया और आज उस काम से ही काफ़ी आगे उसके हुनरबाज हैँ

            खुद के लिए एक सोच तो बना ले अपने विचार मे तो लादे,  एक निर्णय तो लेले निश्चित तो करले कोई एक वजह तो बनाले उसे हर राज करने की,  अपने मन मे बार बार बोल के तो देख,  मुझे करना हैँ…  मुझे करना हैँ…  मुझे करना हैँ…  

            फिर देख सब कुछ बदल जायेगा,  दुनिया पूरी बदलेगी पहले तु तो बदल..  तू कर सकता हैँ तू ही करेगा इस काम को चल अब उठ अपने विचारों से मर दे इस कल के भाई कल को मर दे इसके बापू आलस को और चल दे अपनी मंजिल की और मंजिल भी तेरी हैँ तेरे लिए ही बनी हैँ और तू ही हैँ वो इंसान जो ये कर सकता हैँ बस अब उसके बारे मे सोचना शुरू करदे… 

कपिल कुमार “आयुष”

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