कहानी एवं लेखहिन्दी साहित्य

तिरंगे की कीमत

एक लड़का सड़क पर बहुत सारे तिरंगे हाथ में लेकर खड़ा था। वहीं एक आदमी अपनी गाड़ी में से उतरा और लड़के के पास आ कर उस से पूछा, “अरे छोटू इस तिरंगे की कीमत क्या है?” लड़का कुछ नहीं बोला बस उस आदमी को देखता रहा। आदमी ने थोड़े कड़क शब्दों में कहा ” अरे! बता भाई जल्दी, मुझे खरीदना है, देर हो रही है। लड़के ने बड़ी सहजता से कहा , “साहब, छत्रपति शिवाजी जैसे कई महान योद्धाओं का साहस, झांसी की रानी जैसी वीरांगनाओं का बलिदान, गांधीजी और सत्याग्रहीओ के सत्याग्रह, और भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, मंगल पांडे, जैसे कई क्रांतिकारीओ की शहीदी से हिंदुस्तान ने इस तिरंगे को बनाया है, कमाया है, उन्होंने अपने खून से इस तिरंगे को सींचा है!” “हमारा तिरंगा पैसों का मोहताज नहीं हैं और ना ही पैसों से उसकी कीमत आंकी जा सकती है।” आदमी कुछ देर सोचता रहा और उसने लड़के से पूछा ” ऐसा है, तो फिर तुम इस तिरंगे के बदले पैसे क्यों ले रहा है??” यह सुनते ही लड़के की आंखें नम हो गई और उसने बड़ी भारी और उदासी भरी आवाज में कहा, “साहब आप जो यह पैसे दे रहे हैं ना! वह तिरंगे के नहीं दे रहे वह तो एक तरह का दंड है।” “दंड कैसा दंड? किस चीज का?”आदमी ने बड़े आश्चर्य से पूछा। बच्चे ने सहजता से कहा , “साहब, बहुत सारे लोगों को बस 26 जनवरी और 15 अगस्त को ही तिरंगा याद आता है और दूसरे ही दिन वही तिरंगा सड़कों पर यहां वहां गिरा हुआ मिलता है, और आपने यह तो सुना ही होगा ना कि कोई माँ अपने किसी भी बेटे को भूखा नहीं सोने देती और बेटे की गलती पर उसे दंड भी देती है। हमारे देश में ज्यादातर लोगों को, राष्ट्रभक्ति बस दो ही दिन याद रहती है और इसी बात का यह दंड है, और इसी दंडरूपी पैसों से हमारे जैसे गरीब लोगों का पेट भरता है। यह भारत है साहब यहां पर ऐसा ही होता है और इसीलिए पूरे विश्व में सिर्फ हमारे भारत देश को ‘भारत माँ’ कहा जाता है।

– उन्नति दवे

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