गझलहिन्दी साहित्य

“बताऊँ कैसे ?”

वो जो सुनता ही नहीं उसको बुलाऊँ कैसे ?
बे-ज़बाँ होंट पे अब लफ़्ज़ ये लाऊँ कैसे ?

हाल-ए-शख़्स-ए-बे-दीद सुनाऊँ कैसे ?
याद ही ना हो उसे अब मैं भुलाऊँ कैसे ?

और वो लोग जो नज़रों से उतर गए मेरी
गर मैं लाऊँ तो उन्हें क़ल्ब में लाऊँ कैसे ?

जब गये ही ना कभी उसके मकां-ए-दिल में
बात बाहर की तो बाहर कहीं जाऊँ कैसे ?

चश्म-ए-यार समुंदर-ए-सदफ़ है मेरे
झील उनको जो बताऊँ तो बताऊँ कैसे ?

आसमाँ है वो कोई चाँद-सितारा थोड़ी
गर छुपाऊँ भी तो बादल में छुपाऊँ कैसे ?

और धोखा भी मुझे ख़ुद से मिला है लोगों
मुँह गर ख़ुद को दिखाऊँ तो दिखाऊँ कैसे ?

  • वैशाली बारड

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