काव्यहिन्दी साहित्य

मायाझाल

हल्के भारी तानो से

किसी जलने वाले नेंनो से
आंखो से निकलते कुछ आंसुओ से
माथे से टपकते हुए पसीने से
अनुभवो की गहराई से
अपनो की जुदाए से
माँ की पलकों की आवाजो से
पिता के बोलते कन्धों से
रिश्तों और रिश्तदारो से
गरते उठती लोगों की औकातो से
सराफ़त और सिफारशो से
मिट्टी, मकान और महलों से
भाव, पीडा और उपहारो से
ज्ञान,ध्यान और विज्ञानो से
सागर,जीव और धराओ से
पुरे संसार का मायाजाल बुना हुआ है
– डॉ हिरल जगड़ ‘ हीर ‘

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